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लव-कुश द्वारा रामायण गान 🙏🙏
लव-कुश रामायण गान 🙏🙏
लव-कुश रामायण गान 🙏🙏
जब लव-कुश अपने रामायण गण से पुरवासी और आगन्तुकों का मन मोहने लगे तब एक दिन श्रीराम ने उन दोनों लड़कों को अपने राजसभा में बुलाया। उस समय राजसभा में श्रेष्ठ नैयायिक, दर्शन एवं कल्पसूत्र के विद्वान, संगीत तथा छन्द कला मर्मज्ञ, विभिन्न शास्त्रों के ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ता आदि मानसि रूप थे। लव-कुश को देखकर ऐसा होता है कि दोनों श्रीराम के ही प्रतिरूप हैं। यदि इनके सिर पर जटाजूट और शरीर पर वल्कल न होते हैं तो इनमें और श्रीराम में कोई अंतर नहीं दिखाई देता है। दोनों भाइयों ने अपराह्न तक संबंधित दो सर्गों का संग किया और उसी दिन की घटना को अंजाम दिया। पाठ होने पर श्रीराम ने भरत को आदेश दिया कि दोनों भाइयों को अट्ठारह हजार स्वर्ण मुद्राएं दी जायें, कार्य लव-कुश ने उन्हें लेने से मना कर दिया और कहा कि हम वनवासी हैं, हमें धन की क्या आवश्यकता है? इससे श्रीराम सहित सभी दस्तावेजों को भारी आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा,
यह सुनकर उन मुनिकुमारों ने कहा, “महर्षि वाल्मीकि ने इस महाकाव्य की रचना की है। इसमें चौबीस हजार श्लोक और एक सौ उपाख्यान हैं। इसमें कुल पांच सर्ग और छह काण्ड हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरकाण्ड का सातवाँ काण्ड है। आपका चरित्र ही इस महाकाव्य का विषय है।”
यह सुनकर रघुनाथ जी ने यज्ञ समाप्त होने के संपूर्ण महाकाव्य श्रवण की इच्छा प्रकट की। इस काव्य-कथा को सुनकर उन्हें पता चला कि कुश और लव सीता के ही सुपुत्र हैं।.
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