सीता का रसातल प्रवेश 🙏🙏

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 सीता का रसातल प्रवेश 🙏🙏 




सीता का रसातल प्रवेश 🙏🙏 

सीता के बलिदान और तपस्या का वृतान्त सुनकर रामचन्द्रजी ने अपने विशिष्ट दूत के द्वारा महर्षि वाल्मीकि के पास सन्देश बिजवाया, “यदि सीता का चरित्र शुद्ध है और वे आपकी अनुमति लेते हैं तो यहां आकर जन समुदाय में अपनी शुद्धि प्रमाणित करें और मेरा कलंक करने दूर के लिए शपथ करें तो मैं उनका स्वागत करता हूं।”


यह संदेश वाल्मीकि ने कहलवाय कहा, “ऐसा ही होगा। सितार वही समानं जो श्रीराम करेगा क्योंकि पति स्त्री के लिए परमात्मा होता है।”


यह उत्तर पाकर सितार शपथ के अवसर पर राजा राम ने सभी ऋषि-मुनियों, नगरवासियों आदि को उस समय सभागार में उपस्थित रहने के लिए निमन्त्रित किया।


दूसरे दिन सीता जी का शपथ ग्रहण देखने के लिये नाना देशों से पधारे ऋषि-मुनि, विद्वान, नागरिक सहस्त्रों की संख्या में उस सभा भवन में आकर उपस्थित हो गये। निश्चित समय पर वाल्मीकि सीता को लेकर आये। आगे-आगे महर्षि वाल्मीकि थे और उनके पीछे दोनों हाथ जोड़े, नेत्रों में आँसू बहाती सीता आ रही थीं। वे मन ही मन श्रीराम का चिन्तन कर रही थीं। उस समय महर्षि के पीछे आती हुई सीता इस प्रकार जान पड़ती थीं मानो सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के पीछे श्रुति चली आ रही हो। काषायवस्त्रधारिणी सीता की दीन-हीन दशा देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों का हृदय दुःख से भर आया और वे शोक से विकल हो आँसू बहाने लगे।


वाल्मीकि बोले, “श्रीराम! मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि सीता पवित्र और सती है। कुश और लव आपके ही पुत्र हैं। मैं कभी मिथ्याभाषण नहीं करता। यदि मेरा कथन मिथ्या हो तो मेरी सम्पूर्ण तपस्या निष्फल हो जाय। मेरी इस साक्षी के बाद सीता स्वयं शपथपूर्वक आपको अपनी निर्दोषिता का आश्वासन देंगीं।”


महर्षि के इन बेहतरीन वचनों को सुनकर और सभा के बीच में जानकी भूत देखकर रघुनन्दन बोले, “हे ऋषिश्रेष्ठ! आपका कथन सत्य है और आपके निर्दोष वचनों पर मुझे पूर्ण विश्वास है। वास्तव में वैदेही ने अपनी सच्चरित्रता का विश्वास मुझे अग्नि के रूप में दिया था परंतु लोकापवाद के कारण ही उन्हें त्यागना पड़ा। आप मुझे इस अपराध के लिए क्षमा करें।”


तत्पश्चात् श्रीराम सभी ऋषि-मुनियों, वैश्विक और उपस्थिति जनसमूह को लक्ष्य बनाकर बोले, “हे मुनि एवं विज्ञजनों! मुझे महर्षि वाल्मीकि जी के कथन पर पूर्ण विश्वास है परन्तु यदि सीता स्वयं अपनी स्वयं की शुद्धि का पूर्ण विश्वास दें तो मुझे मूढ़ता आएगी।”


राम का कथन होते ही सितार का हाथ जोड़कर, आंख झुकाकर बोलीं, “मैंने अपने जीवन में यदि श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्त कभी किसी दूसरे पुरुष का चिन्तन न किया हो तो मेरी सत्यता के प्रमाणस्वरूप भगवती पृथ्वी देवी अपनी गोद में मुझे स्थान दें।”


सीता के इस प्रकार शपथ ग्रहण ही पृथ्वी फटी। उनमें से एक सिंहासन निकला। उसी के साथ पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूप में प्रकट होती हैं। वे दोनों बंधे हुए आगे बढ़े और धीरे-धीरे सीता को उठाया और प्रेम से सिंहासन पर बिठा लिया। देखते-देखते सितार सहित सिंहासन पृथ्वी में लुप्त हो गए। सभी दर्शक स्तब्ध से यह असामान्य दृश्य देखते हैं। पूरा माहौल मोहाच्छन्न सा हो गया।.

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