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अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान 🙏🙏
#पासजी
अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान 🙏🙏
अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान 🙏🙏
सभी भाइयों के आदेश को मानकर रामचन्द्र जी ने वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप आदि ऋषियों को बुलाने के लिए परामर्श किया। उनकी स्वीकृति मिल जाने पर वानरराज सुग्रीव को संदेश भेजा गया कि वे विशाल वानर सेना के साथ यज्ञशालाओं में भाग लेने के लिए आवें। फिर विभीषण सहित अन्य राज-महाराजाओं को भी इसी प्रकार के संदेश और निमन्त्रण भेजा गया। संसार भर के ऋषि-महर्षियों को भी तालाब में समाहित किया गया। कुशल कलाकारों द्वारा नैमिषारण्य में गोमती तट पर विशाल एवं कलापूर्ण यज्ञ मण्डप बनाने की व्यवस्था की गई। विशाल हवन सामग्री के साथ अग्नितुकों के भोजन, निवास आदि के लिए बहुत बड़े स्तर पर व्यवस्थापन किए गए। नैमिषारण्य में दूर-दूर तक बड़े-बड़े बाजार लगवाये गए। सीता की सुवर्णमय प्रतिमा बनवाई गई।लक्ष्मण को एक विशाल सेना और शुभ लक्षण से संपन्न कृष्ण वर्ण अश्व के साथ विश्व भ्रमण के लिए भेजा गया।
देश-देश के राजाओं ने श्रीराम को अद्भुत उपहार देकर अपना पूर्ण सहयोग का नुकसान दिया। आगत याचकों को मनचाही वस्तुएँ संकेतमात्र से ही दी जा रही थीं। उस यज्ञ को देखकर ऋषि-मुनियों का कहना था कि ऐसा यज्ञ पहले कभी नहीं हुआ था। यह यज्ञ एक वर्ष से भी अधिक समय तक चलता रहता है। इस यज्ञ में सम्मिलित होने के कारण महर्षि वाल्मीकि भी अपने शिष्यों सहित पधारे। जब उनके निवास की व्यवस्था हो गई तो उन्होंने अपने दो शिष्यों प्रेम और कुश को आज्ञा दी कि वे दोनों भाई नगर में सर्वत्र घुमाकर रामायण काव्य का गान करें। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई प्रश्न उठता है कि तुम रिश्ता हो बेटा तो तुम केवल इतना कहते हो कि हम ऋषि वाल्मीकि के शिष्य हैं। यह आदेश पाकर सीता के दोनों पुत्र रामायण का सस्वर गान करने के लिए पड़े।.
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