लक्ष्मण का परित्याग 🙏🙏


लक्ष्मण का परित्याग 🙏🙏 






लक्ष्मण का परित्याग 🙏🙏 

जब इस प्रकार राज्य करते हुए श्रीरघुनाथजी को बहुत वर्षों तक आकलन किया गया तब एक दिन की अवधि में तपस्वी के वेश में राजद्वार पर आए। उन्होंने संदेश भेजा कि मैं महर्षि अतिबल का दूत हूँ और अति आवश्यक कार्य से श्री रामचन्द्र जी से कामना चाहता हूँ। संदेश पाकर राजचन्द्रजी ने उसे फोन किया। काल के उपस्थित होने पर श्रीराम ने उन्हें सत्कारपूर्वक यथोचित आसन दिया और महर्षि अतिबल का सन्देश सनाने का आग्रह किया। यह सुनकर मुनिवेषधारी काल ने कहा, “यह बात अत्यंत विश्वसनीय है। यहाँ हम दोनों के अतिरिक्त कोई तीसरा व्यक्ति नहीं रहना चाहिए। मैं आपको इसी शर्त पर उनका संदेश दे सकता हूं कि यदि बातचीत के समय कोई व्यक्ति आ जाए तो आप उसका वध कर देंगे।


श्रीराम ने काल की बात मानक लक्ष्मण से कहा, “तुम इस समय द्वारपाल को विदा कर दो और स्वयं द्वार पर रुक जाओ। ध्यान रहे, इन मुनि के जाने तक कोई यहां नहीं आएगा। जो भी आएगा, मेरे द्वारा मारा जाएगा।”


जब लक्ष्मण वहां से चले गए तो उन्होंने काल से महर्षि का सन्देश सुनाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर काल बोला, “मैं आपकी माया से आपके पुत्र काल हूँ। ब्रह्मा जी ने कहा है कि आपने लोगों की रक्षा करने के लिए जो प्रतिज्ञा की थी वह पूरी हो गई। अब आपके स्वर्ग लौटने का समय हो गया है। वैसे आप भी अब भी रुकें भले ही आपकी मर्जी है।”


यह सुनकर श्रीराम ने कहा, “जब मेरा कार्य पूरा हो गया तो फिर मैं यहाँ क्या देखता हूँ? मैं शीघ्र ही अपने लोक को लौटूंगा।”


जब काल रामचन्द्र जी से इस प्रकार वार्तालाप कर रहा था, उसी समय राजप्रासाद के द्वार पर महर्षि दुर्वासा रामचन्द्र से मिलने आये। वे लक्ष्मण से बोले, “मुझे तत्काल राघव से मिलना है। विलम्ब होने से मेरा काम बिगड़ जायेगा। इसलिये तुम उन्हें तत्काल मेरे आगमन की सूचना दो।”


लक्ष्मण बोले, “वे इस समय अत्यन्त व्यस्त हैं। आप मुझे आज्ञा दीजिये, जो भी कार्य हो मैं पूरा करूँगा। यदि उन्हीं से मिलना हो तो आपको दो घड़ी प्रतीक्षा करनी होगी।”


यह सुनते ही मुनि दुर्वासा का मुख क्रोध से तमतमा आया और बोले, “तुम अभी जाकर राघव को मेरे आगमन की सूचना दो। यदि तुम विलम्ब करोगे तो मैं शाप देकर समस्त रघुकुल और अयोध्या को अभी इसी क्षण भस्म कर दूँगा।”


ऋषि के क्रोधयुक्त वचन सुनकर लक्ष्मण सोचने लगे, चाहे मेरी मृत्यु हो जाये, रघुकुल का विनाश नहीं होना चाहिये। यह सोचकर उन्होंने रघुनाथजी के पास जाकर दुर्वासा के आगमन का समाचार जा सुनाया। रामचन्द्र जी काल को विदा कर महर्षि दुर्वासा के पास पहुँचे। उन्हें देखकर दुर्वासा ऋषि ने कहा, “रघुनन्दन! मैंने दीर्घकाल तक उपवास करके आज इसी क्षण अपना व्रत खोलने का निश्चय किया है। इसलिये तुम्हारे यहाँ जो भी भोजन तैयार हो तत्काल मँगाओ और श्रद्धापूर्वक मुझे खिलाओ।”


रामचन्द्र जी ने उन्हें सब प्रकार से सन्तुष्ट कर विदा किया। फिर वे काल कि दिये गये वचन को स्मरण कर भावी भ्रातृ वियोग की आशंका से अत्यन्त दुःखी हुये।


अग्रज को दुःखी देख लक्ष्मण बोले, “प्रभु! यह तो काल की गति है। आप दुःखी न हों और निश्चिन्त होकर मेरा वध करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें।”


लक्ष्मण की बात को वे और व्याकुल भी सुन गए। वे गुरु वशिष्ठ और मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें संपूर्ण वृत्तांत सुनाया। यह सुनकर वसिष्ठ जी कहते हैं, “राघव! आप आज शुरुआत ही यह संसार त्याग कर अपने लोगों को जाना है। इसका विज्ञापन की शुरुआत हो गई है। इसलिए आप लक्ष्मण का परित्याग करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लें। प्रतिज्ञा नष्ट होने से धर्म का लोप हो जाता है। भिक्षु पुरुषों का त्याग करना उनके वध करने के समान होता है।”


गुरु वसिष्ठ की सम्मतिर श्री राम ने दुःखी मन से लक्ष्मण का परित्याग कर दिया। वहां से चलकर लक्ष्मण सारू के तट पर आते हैं। जल का आचमन कर हाथ जोड़ना, प्राणवायु को कहना, उन्होंने अपना प्राण विसर्जन कर दिया।.

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